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महासती श्री कुमुदलता जी म.सा.
(संक्षिप्त परिचय):-
| विवरण | जानकारी |
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| माता| श्रीमती कमलाबाई जैन |
| पिता | श्री बाबूलाल जी जैन |
| जन्म | 28 नवम्बर, 1970 |
| जन्म स्थान| जावरा |
| विशेषता| ज्योतिष का विशेष ज्ञान, प्रखर वक्ता, मधुर व्याख्यानी, वाणी की जादूगर |
| शिक्षा| एम.ए. |
| दीक्षा | 23 मार्च, 1983 कामारेड्डी (आंध्र प्रदेश) |
| विचरण क्षेत्र | महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, गुजरात, तमिलनाडू, कर्नाटक |
| आगम | दशवैकालिक, नंदिसूत्र, ज्ञातासूत्र, आचांरांगसूत्र, सूखविपाक सूत्र, तत्वार्थसूत्र, सूर्य-चंद्र प्रज्ञप्ति, उत्तराध्ययन सूत्र आदि अनेक आगमों का ज्ञान |
| परमार्थिक संस्था | आपकी प्रेरणा एवं सानिध्य से आदेश्वर फाउंडेशन संस्था चलित है। |
प्रेरणा स्त्रोत
बचपन के वो सुनहरे दिन उम्र रही होगी लगभग 11 वर्ष उस वक्त दलीगाँव की गलियों से गुजर रही थी। सामने से एक अर्थी निकल रही थी, बहुत सारे लोग उस अर्थी के पीछे-पीछे चल रहे थे। स्वजन, सगे, सम्बन्धी आक्रंद कर रहे थे, रो रहे थे। मेरा नन्हा सा मन भी तड़प उठा, रो उठा। मुझे बहुत दुखः हुआ कि व्यक्ति इस दुनिया में आता है तब परिवार वाले कितनी खुशी मनाते हैं और व्यक्ति के इस दुनियां से चले जाने पर मातम का दृश्य होता है। उपरोक्त घटना ने मेरे मन को झकझोर के रख दिया। एक अर्थी ने जीवन के अर्थ को समझने के लिए आंदोलित कर दिया। मेरा नन्हा सा मन चिंतन, मनन करने लगा कि जो व्यक्ति जन्म लेता है उसे एक दिन मरना पड़ता है, मृत्यु अवश्यम्भावी है।
एक श्मशान के बाहर लिखा था...
मंजिल तो तेरी यही थी बस... जिंदगी गुजर गयी तेरी आते-आते...
क्या मिला तुझे इस दुनिया से? अपनों ने ही जला दिया तुझे जाते-जाते ।।
मुझे भी एक दिन मरना पड़ेगा तो क्यों न जन्म-मरण के इस बंधन से मुक्ति का मार्ग तलाश करूँ। "जहाँ चाह वहाँ राह" की उक्ति को चरितार्थ करते हुए मेरे सद्भाग्य से पूज्या गुरूणी मैया श्री कमलावती जी म.सा. का दलीगाँव में पदार्पण हुआ। पूज्य पिता श्री बाबूलाल जी मुझे पूज्या गुरूणी मैया के दर्शनार्थ ले गये। मन में पहले से ही जन्म और मृत्यु की उधेड़बुन चल रही थी। गुरूवर्या से समाधान चाहा तो उन्होंने फरमाया अर्थी उठने से पहले जीवन के अर्थ को समझलो तभी तुम्हारा जीवन सार्थक है। आपने जैन कुल में जन्म लिया है, सर्वश्रेष्ठ जैन धर्म मिला है, जिनेश्वर का शासन मिला है। इस अमूल्य जीवन को यूँ ही मत गवाँ देना 'संयम खलु जीवनम्' संयम ही जीवन है।
गुरूणी मैया की बातें मुझे सार गर्भित लगी। "शुभस्य शिघ्रम" को अपनाते हुए मैने पूज्या मातुश्री से आज्ञा ली और गुरूणी मैया के पास अध्ययन हेतु आ गई। गुरूणी मैया ने अथक प्रयास से मुझ अनगड़ पत्थर को तराशने का सम्यक पुरूषार्थ किया।
"हाथ तुम न थामते तो कौन जाने किधर जाते, हम घड़े थे मिट्टी के टूट कर बिखर जाते।
गुरूणी कमला आपने रश्मि दे दी रैन में, शब्द सुनकर आपके डूबते भी उबर जाते ।।"
इस प्रकार ज्ञान-दर्शन-चरित्र और तप रूपी सद्गुणों से मेरे जीवन की बगियाँ को महका दिया ऐसी अनंत उपकारी मेरे जीवन की शिल्पकार गुरूणी मैया को आत्मीय नमन।
धर्म की परिभाषा
जैन धर्म वीतराग की आराधना का धर्म है। क्रोध, मान, maya और लोभ अल्प हो, क्षीण हो, समाप्त हो, यह वीतरागता की दिशा में प्रस्थान है। धर्म वह है, जो हमारी चेतना को जागृत करे, जिससे आचार बदले। धर्म विशुद्ध आत्मा का स्वरूप है। धर्म चेतना के उन्नयन की, उसके विकास की चीज है। धर्म जीवन में शक्ति और श्रद्धा बढ़ाता है। जो धर्म की शरण में आ जाता है, धर्म न केवल उसका संरक्षण ही करता है, अपितु उसे आत्म-मुक्ति की दिशा भी प्रदान करता है।
धर्म ही संसार को त्राण दे सकता है, मृत होती मानवता को प्राण दे सकता है।
धर्म की महत्ता को नकारों मत कोई, धर्म से ही सबका कल्याण हो सकता है।।"
सिंह में सिंह केसरी सिंह श्रेष्ठ है, गज में गज ऐरावत गज श्रेष्ठ है,
तप में तप बह्मचर्य तप श्रेष्ठ है और धर्म में धर्म जैन धर्म श्रेष्ठ है।"
धर्म का मूल
उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन में धर्म का मूल विनय बताया गया है। "विनय धम्मस मूलः" अर्थात विनय धर्म का मूल है। विनय मानवीय जीवन का महान गुण है। जिस व्यक्ति के जीवन में विनय गुण है तो बाकी के सभी सद्गुण स्वतः चले आते है। विनीत व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र का गौरव होता है। विनीत व्यक्ति को धर्म सहजता, सरलता से उपलब्ध होता है। अगर व्यक्ति को जीवन का उत्थान करना है तो विनय गुण को अपनाना ही पड़ेगा। लघुता में ही प्रभुता बसी है यही धर्म का मूल है अगर ये बात समझ में आ जाये तो आत्मा प्रगति करते हुए अपनी मंजिल को पा सकती है और सिद्धालय में अवस्थित हो सकती है। अस्तु।